1. मैं समण हूँ
मैं समण हूँ, यही पुकार,
यही हमारा सच्चा श्रृंगार।
धरती जैसी मेरी पहचान,
समणों से ऊँची नहीं शान।
पुरखों की यह अमर निशानी,
संतों की पावन कहानी।
जिसने अपने मूल को जाना,
उसने जीवन सफल माना।
समणों की शान निराली,
जैसे फूलों की हरियाली।
जहाँ समण का नाम गूँजे,
वहाँ विजय के दीप ही सूझें।
ना झुकना है, ना रुकना है,
एकता संग आगे बढ़ना है।
संघ हमारी सच्ची ताकत,
यही हमारी सबसे दौलत।
“आजाद” यही संदेश सुनाए,
समण सदा सम्मान बढ़ाए।
सबसे प्यारी अपनी पहचान,
मैं समण हूँ — यही अभिमान।
2. समण पहचान
मैं समण हूँ, गर्व से बोलूँ,
सत्य की राह सदा ही खोलूँ।
मेरी पहचान सबसे न्यारी,
जैसे चाँदनी लगे प्यारी।
समण संस्कृति अमर कहानी,
इसमें बसती प्रेम निशानी।
पूर्वजों का मान बढ़ाएँ,
नई पीढ़ी को राह दिखाएँ।
समणों की शान निराली,
जैसे बगिया की हर डाली।
जहाँ एकता साथ रहती,
वहाँ सफलता कदम चूमती।
संघ में ही बल बसता है,
यही जीवन को सजता है।
बिखर गए तो हार मिलेगी,
मिलकर नई बहार खिलेगी।
“आजाद” का बस यही विचार,
समण बने जग में आधार।
अपनी जड़ से जुड़े रहो,
सम्मान संग आगे बढ़ो।
3. समणों की आवाज़
मैं समण हूँ, यह अभिमान,
यही हमारी सच्ची पहचान।
धरती, अम्बर, नदियाँ गाएँ,
समण गौरव जग फैलाएँ।
समणों की शान निराली,
जैसे सावन की हरियाली।
संतों ने जो राह दिखाई,
उससे जीवन ज्योति पाई।
ना ऊँच-नीच, ना कोई भेद,
समण समाज बनेगा खेद।
जब सब मिलकर साथ चलेंगे,
हर मुश्किल से जीतेंगे।
अपना इतिहास पुराना है,
यह गौरव का खजाना है।
जो अपनी पहचान बचाए,
वही दुनिया में मान पाए।
“आजाद” यही गीत सुनाए,
समण सदा सिर ऊँचा उठाए।
सबसे सुंदर अपनी जात,
समण समाज हमारी बात।
4. समण समाज
मैं समण हूँ, यही सम्मान,
यही मेरी सच्ची पहचान।
समण संस्कृति फूलों जैसी,
शीतल छाया बादल जैसी।
समणों की शान महान,
सबसे ऊँची अपनी आन।
जिस घर में यह नाम रहेगा,
वहाँ सदा सुखधाम रहेगा।
एकता का दीप जलाओ,
समण समाज आगे लाओ।
साथ रहोगे जीतोगे तुम,
दुनिया में चमकोगे तुम।
पुरखों की वाणी अपनाओ,
अपने गौरव को बचाओ।
जो अपनी पहचान भूले,
जीवन में वो राहें झूले।
“आजाद” की यह अमर जुबानी,
समण समाज सबसे ज्ञानी।
गर्व से हर बच्चा बोले,
समण नाम दिलों में डोले।
5. समण गौरव
मैं समण हूँ, यही विचार,
यही जीवन का श्रृंगार।
सबसे प्यारी अपनी जात,
समण समाज हमारी बात।
समणों की शान निराली,
जैसे फूलों की रखवाली।
संस्कृति अपनी अमर रहेगी,
जब तक एकता संग रहेगी।
संतों ने जो दीप जलाया,
उसने जग को राह दिखाया।
सत्य और सम्मान की राह,
यही समणों की सच्ची चाह।
ना डरना है, ना झुकना है,
समण बनकर आगे बढ़ना है।
संघ में अपनी शक्ति भारी,
यही हमारी जीत हमारी।
“आजाद” यही अलख जगाए,
समण गौरव विश्व में छाए।
सबसे सुंदर अपनी पहचान,
समण समाज हमारा मान।
6. समण संस्कृति
मैं समण हूँ, यह पहचान,
सबसे ऊँची मेरी शान।
धरती जैसी इसकी माया,
सबको प्रेम का पाठ पढ़ाया।
समणों की शान निराली,
जैसे गंगा की हर लाली।
सदियों से यह दीप जला है,
सत्य का सूरज यहाँ पला है।
एकता में बल बसता है,
संघ से समाज सजता है।
मिल-जुलकर जो साथ रहेंगे,
हर मंज़िल को जीतेंगे।
अपनी संस्कृति बचानी है,
नई पीढ़ी को सिखानी है।
जो अपनी जड़ भूल जाएगा,
वो जीवन में पछताएगा।
“आजाद” यही बात कहे,
समण सदा आगे बढ़े।
गर्व से हर कोई बोले,
समण नाम जग में डोले।
7. समण अभिमान
मैं समण हूँ, गर्व अपार,
यही जीवन का आधार।
सबसे सुंदर अपनी जात,
समण समाज हमारी बात।
समणों की शान निराली,
जैसे खेतों की हरियाली।
जहाँ समण का नाम रहेगा,
वहाँ सदा सम्मान रहेगा।
मिलकर रहना धर्म हमारा,
एकता सबसे बड़ा सहारा।
संघ बना जब मजबूत दीवार,
हार गई हर एक ललकार।
पूर्वजों का मान बढ़ाओ,
अपनी जड़ों से जुड़ जाओ।
संस्कृति अपनी अमर रहेगी,
जब तक एकता संग रहेगी।
“आजाद” का यह संदेश,
समण समाज बने विशेष।
हर दिल में यह आग रहे,
समण गौरव जाग रहे।
8. समणों की जीत
मैं समण हूँ, यही पहचान,
यही हमारी सच्ची शान।
धरती अम्बर गान सुनाएँ,
समण गौरव जग में छाएँ।
समणों की शान निराली,
जैसे फूलों की रखवाली।
संतों ने जो राह दिखाई,
उससे जीवन ज्योति पाई।
संघ में अपनी शक्ति भारी,
यही हमारी जीत हमारी।
बिखर गए तो हार मिलेगी,
मिलकर नई बहार खिलेगी।
अपने गौरव को पहचानो,
पूर्वजों का मान बढ़ाओ।
समण संस्कृति अमर रहेगी,
जब तक एकता संग रहेगी।
“आजाद” यही अलख जगाए,
समण समाज आगे आए।
सबसे प्यारी अपनी आन,
समण समाज महान।
9. समण की आवाज़
मैं समण हूँ, यही विचार,
यही मेरा सच्चा श्रृंगार।
समणों की शान निराली,
जैसे सावन की हरियाली।
संस्कृति अपनी सबसे न्यारी,
दुनिया में लगती है प्यारी।
जो इससे जुड़ जाता है,
सम्मान वही पाता है।
एकता ही सबसे बलवान,
यही समणों की पहचान।
हाथों में जब हाथ रहेंगे,
हर मैदान में जीतेंगे।
पूर्वजों की अमर कहानी,
संतों की पावन वाणी।
इन्हें सदा जीवित रखना,
अपने गौरव को मत खोना।
“आजाद” यही गीत सुनाए,
समण समाज आगे आए।
गर्व से हर कोई बोले,
समण नाम दिलों में डोले।
10. समण समाज महान
मैं समण हूँ, यही अभिमान,
सबसे बड़ी मेरी पहचान।
समणों की शान निराली,
जैसे फूलों की हर डाली।
समण संस्कृति अमर रहेगी,
जब तक एकता संग रहेगी।
मिल-जुलकर जो साथ चलेंगे,
हर मंज़िल को जीतेंगे।
संतों की वाणी अपनाओ,
अपने गौरव को बचाओ।
जो अपनी जड़ों से जुड़ता,
वही सफलता को छूता।
ना झुकना है, ना डरना है,
समण बनकर आगे बढ़ना है।
संघ हमारी सच्ची ताकत,
यही हमारी सबसे दौलत।
“आजाद” का यह संदेश,
समण समाज बने विशेष।
सबसे प्यारी अपनी शान,
समण समाज महान।
