1.
मैं समण हूँ, यही मेरी पहचान है,
मेरे पुरखों का यही सम्मान है।
सत्य की राहों पे चलना सीख लिया,
मेरे जीवन का यही अभियान है।
झुक नहीं सकता किसी भी दौर में,
मेरे भीतर जागता स्वाभिमान है।
“आजाद” दुनिया से ये कहता फिरे,
समण होना सबसे बड़ा अभिमान है।
2.
नाम समण का दिल में सजाकर रखो,
अपनी संस्कृति को बचाकर रखो।
ये विरासत बड़ी कीमती दोस्तों,
इसको हर हाल में अपनाकर रखो।
जो जुड़े अपनी जड़ों से उम्र भर,
वो ही दुनिया में चमककर दिखो।
“आजाद” कहता है सीना तानकर,
अपनी पहचान जगाकर रखो।
3.
मैं समण हूँ, ये सदा कहता रहूँ,
हर अँधेरे में दिया बनता रहूँ।
मेरे पुरखों की अमर पहचान हूँ,
उनके सपनों का नया अरमान हूँ।
एकता से ही हमारी जीत है,
इसलिए सबको यही समझाता रहूँ।
“आजाद” हूँ मैं अपने विचारों से भी,
समण संस्कृति का ध्वज उठाता रहूँ।
4.
समणों की शान निराली होती है,
इनकी बातें भी मतवाली होती हैं।
सत्य और सम्मान की राहों पर,
इनकी हर सोच निराली होती है।
जो अपनी पहचान बचा लेते हैं,
उनकी दुनिया भी उजाली होती है।
“आजाद” कहता है गर्व से सुन लो,
समणों की बात निराली होती है।
5.
मेरी पहचान है समण होना,
मेरे दिल का अरमान है समण होना।
जो मुझे मेरी जड़ों से जोड़ दे,
मेरे जीवन की वो जान है समण होना।
सत्य की राहों का उजियारा है,
हर समण की ये शान है समण होना।
“आजाद” दुनिया को यही कहता है,
सबसे ऊँचा सम्मान है समण होना।
6.
समण हूँ मैं, ये मेरा नारा है,
यही जीवन का उजियारा है।
अपने पुरखों की अमर थाती को,
दिल से हमने खूब संवारा है।
एकता में ही हमारी ताकत है,
ये जमाने को भी गंवारा है।
“आजाद” सच को यही कहता है,
समण होना ही सितारा है।
7.
दिल में समण समाज बसाया मैंने,
अपनी जड़ों को अपनाया मैंने।
दुनिया चाहे कुछ भी कहती रहे,
सत्य का दीप जलाया मैंने।
गर्व से नाम लिया पुरखों का,
अपना इतिहास बचाया मैंने।
“आजाद” हूँ मैं अपने विचारों से,
समण ध्वज को उठाया मैंने।
8.
समण संस्कृति का उजाला हूँ मैं,
अपने समाज का रखवाला हूँ मैं।
झुक नहीं सकता किसी ताकत से,
सत्य की राहों का वाला हूँ मैं।
जो भी पूछे मेरी पहचान यहाँ,
सीना तान कहूँ — समण वाला हूँ मैं।
“आजाद” मेरी यही कहानी है,
अपने लोगों का मतवाला हूँ मैं।
9.
समणों की शान बचानी होगी,
अपनी पहचान जगानी होगी।
जो बिछड़ते हैं अपनी जड़ों से,
उनको राह दिखानी होगी।
एकता में ही हमारी ताकत है,
सबको ये बात बतानी होगी।
“आजाद” कहता है हर समण से,
अब आवाज उठानी होगी।
10.
मैं समण हूँ, ये छुपाऊँ कैसे,
अपने दिल को मैं झुकाऊँ कैसे।
मेरे पुरखों का बड़ा इतिहास,
उसको दुनिया से मिटाऊँ कैसे।
मेरी नस-नस में बसा है गौरव,
इस हकीकत को भुलाऊँ कैसे।
“आजाद” कहता है गर्व से सुन लो,
अपनी पहचान मिटाऊँ कैसे।
11.
समण समाज मेरी जान रहा,
यही दिल का अरमान रहा।
सत्य की राहों पर चलने का,
पुरखों से ही वरदान रहा।
जो भी जुड़ा अपनी मिट्टी से,
उसका जीवन आसान रहा।
“आजाद” यही दुनिया से कहे,
समण होना सम्मान रहा।
12.
दिल में समण नाम बसाया है,
जीने का ढंग सिखाया है।
सत्य और प्रेम की राहों ने,
हर मुश्किल से बचाया है।
गर्व से बोलो अपनी पहचान,
पुरखों ने यही बताया है।
“आजाद” का यही पैगाम सुनो,
समण होना ही सरमाया है।
13.
समण हूँ तो सर उठाकर चलूँ,
हर मुश्किल में मुस्कुराकर चलूँ।
अपनी संस्कृति को साथ लेकर,
नई राहों को सजाकर चलूँ।
जो भी पूछे मेरी जात यहाँ,
गर्व से नाम बताकर चलूँ।
“आजाद” की यही ख्वाहिश है,
मैं समण हूँ ये गाकर चलूँ।
14.
समणों की पहचान बड़ी प्यारी है,
ये दुनिया में सबसे न्यारी है।
सत्य और सम्मान की राहों पर,
इनकी हर सोच उजियारी है।
जो अपनी जड़ों से जुड़ते हैं,
उनकी दुनिया भी सुखकारी है।
“आजाद” कहता है गर्व से सुन लो,
समण संस्कृति सबसे प्यारी है।
15.
मेरे दिल में समण समाज रहे,
हर पल उसका ही राज रहे।
अपने पुरखों की अमर थाती पर,
सदा हमें भी नाज़ रहे।
जो भी अपनी जड़ों से जुड़ जाए,
उसके जीवन में साज़ रहे।
“आजाद” की बस यही तमन्ना,
समणों का ऊँचा ताज रहे।
16.
मैं समण हूँ, ये मेरी शान रही,
मेरे जीवन की पहचान रही।
हर मुश्किल में जिसने साथ दिया,
वो अपनी ही आन रही।
सत्य की राहों पर चलने की,
पुरखों की ही सीख महान रही।
“आजाद” यही दुनिया से कहे,
समण संस्कृति वरदान रही।
17.
समण नाम बड़ा प्यारा लगता है,
दिल को सबसे न्यारा लगता है।
जब भी अपनी जड़ों की बात चले,
हर सपना सुनहरा लगता है।
एकता से ही हमारी ताकत है,
ये संदेश सुनहरा लगता है।
“आजाद” कहता है गर्व से सुन लो,
समण होना सितारा लगता है।
18.
मेरे शब्दों में समण बसता है,
दिल में अपना समाज बसता है।
जो भी अपनी पहचान बचाए,
उसके भीतर उजास बसता है।
सत्य की राहों पर चलने से,
हर जीवन में विश्वास बसता है।
“आजाद” की यही पुकार सुनो,
समणों में इतिहास बसता है।
19.
समण हूँ तो मुझे अभिमान भी है,
अपने पुरखों का सम्मान भी है।
मेरी संस्कृति मेरी ताकत है,
दिल में उसका स्थान भी है।
जो जुड़ा अपनी जड़ों से सदा,
उसके जीवन में ज्ञान भी है।
“आजाद” यही सच कहता है,
समण होना वरदान भी है।
20.
मैं समण हूँ, यही मेरा गीत रहे,
हर दिल में अपना प्रीत रहे।
अपनी संस्कृति की खुशबू से,
जीवन का हर संगीत रहे।
गर्व से बोलो अपनी पहचान,
यही सबसे बड़ी जीत रहे।
“आजाद” का ये संदेश सुनो,
समण समाज सदा अजीत रहे।
