1. समण संघ की शान
समण संघ पुरातन धारा,
प्रकृति जैसा निर्मल प्यारा।
जिसने इसका साथ निभाया,
उसने जीवन सत्य को पाया।
वन की छाया, नदी का पानी,
संघ हमारी सच्ची कहानी।
जुड़ेंगे जब सारे समण,
जीतेगा फिर अपना वतन।
2. एकता का दीप
पर्वत जैसी अटल कहानी,
समण संघ की अमर निशानी।
हवा सुनाए इसके गीत,
प्रकृति करती इसका प्रीत।
टूटेगा हर भय का जाल,
जब होगा संघ का कमाल।
एक साथ जब बढ़ेंगे पग,
जीतेंगे समण हर इक जग।
3. पुरखों की विरासत
पुरखों ने जो बीज लगाया,
समण संघ बन वृक्ष सुहाया।
हरियाली सा इसका मान,
धरती जैसी इसकी शान।
जो संघ से दूरी रखते,
जीवन में वो राह भटकते।
संघ से जुड़कर हाथ मिलाओ,
जीत का सूरज फिर उगाओ।
4. प्रकृति का संदेश
नदियाँ मिलकर सागर बनती,
चिड़ियाँ मिलकर उड़ना जानती।
प्रकृति देती यही पैगाम,
संघ में बसता सच्चा नाम।
समण जब संग-साथ निभाएँ,
दुश्मन भी फिर सिर झुकाएँ।
एकता ही सबसे बड़ी ढाल,
संघ हमारा शक्ति विशाल।
5. समण संस्कृति
पीपल जैसी ठंडी छाया,
समण संघ ने प्रेम सिखाया।
मिट्टी जैसी इसकी गंध,
इसमें बसती जीवन सुगंध।
जो भी इससे जुड़ जाता,
अपना गौरव फिर पाता।
संघ से ही शक्ति मिलेगी,
समण जाति आगे चलेगी।
6. जीत का मार्ग
समण संघ की यही पुकार,
मिलकर चलो मेरे यार।
जंगल, पर्वत, खेत, बहार,
प्रकृति देती हमें दुलार।
बिखरे रहकर हार मिलेगी,
जुड़कर नई बहार खिलेगी।
एक सूत्र में बंधना होगा,
तभी समण को जीत मिलेगा।
7. धरती का संघ
धरती जैसा विशाल हृदय,
समण संघ का पावन उदय।
सूरज जैसी इसकी ज्योति,
दूर करे हर दुख और क्लांति।
जो संघ का सम्मान करेगा,
वही भविष्य निर्माण करेगा।
हाथों में जब हाथ रहेंगे,
समण तभी विजयी बनेंगे।
8. समणों का हुंकार
प्रकृति की हर धड़कन बोले,
समण संघ के नारे डोले।
पुरातन इसकी हर पहचान,
इसमें बसता अपना मान।
ना बंटेंगे, ना झुकेंगे,
मिलकर आगे बढ़ते रहेंगे।
संघ ही अपनी सच्ची जीत,
संघ ही अपना गौरव गीत।
9. समण शक्ति
बरगद जैसा गहरा मूल,
समण संघ नहीं कोई भूल।
यह इतिहासों की पहचान,
इसमें बसती अपनी जान।
संगठन में शक्ति बसती,
एकता से दुनिया हँसती।
जब सब समण साथ चलेंगे,
हर मैदान में जीतेंगे।
10. विजय का मंत्र
समण संघ प्रकृति का फूल,
इससे सुंदर नहीं उसूल।
हवा, नदी और नीला गगन,
गाते इसके पावन भजन।
आज यही संकल्प करें,
संघ से जीवन सफल करें।
मिल-जुलकर आगे बढ़ना है,
समण होकर जीतना है।
